BRAJ RAS DHARA 21/12/2018



राधे राधे
आज की “ब्रज रस धारा”
दिनांक 21/12/2018

जन्म -श्रीलोकनाथजी का प्रादुर्भाव विक्रम सम्वत 1540 में पूर्व बंगाल के यशोहर जनपदान्तर बालखेड़ा ग्राम में हुआ था. इनके पिता का नाम श्रीपद्मनाभ चक्रवर्ती तथा माता का नाम सीतादेवी था.बचपन से ही इनकी प्रतिभा अत्यन्त प्रखर थी.

श्रीलोकनाथ गोस्वामीजीश्रीकृष्ण चैतन्य माह्प्रभु के एक पार्षद थे. इनकी श्रीराधाकृष्ण के प्रति अहर्निश एक जैसी प्रीति थी.इन्होंने अपने पिताजी से ही व्याकरण, न्याय, काव्य, कोश एवं अलंकारादि का अध्ययन किया.फिर ये वेदान्त एवं भागवतादि ग्रन्थों का अध्ययन करने के लिए शान्तिपुर, श्रीअद्वैताचार्य की पाठशाला के छात्र बने.

श्री अद्वैताचार्यजी की पाठशालाश्रीमद्भागवत का पाठ,कीर्तन एवं पारायण इनको प्राण के समान प्रिय था.उन दिनों श्री गौरांग महाप्रभूजी भी वहीं अध्ययन करते थे.प्रथम साक्षात्कार में ही इनमें एवं श्रीमहाप्रभुजी में अपार स्नेह हो गया.

उस पर भी एक दिन श्रीअद्वैताचार्यजी ने श्रीलोकनाथ गोस्वामीजी का हाथ पकड़कर श्रीमहाप्रभुजी को सोंपते हुए कहा, ‘ इसे अपना करके मानना.तब से श्रीमहाप्रभुजी का इनके प्रति स्नेह और भी बढ़ गया.हमेशा इन्हें अपने साथ रखते.अध्ययन पूर्ण होने पर जब दोनों अपने-अपने घर गये तो कुछ समय के लिए दोनों में वियोग रहा परन्तु कुछ ही दिनों के बाद जब श्रीमहाप्रभुजी अध्यापकी छोड़कर संकीर्तन प्रचार में लगे, उन्हीं दिनों माता-पिता का देहान्त हो जाने से श्रीलोकनाथ गोस्वामीजी भी संसार से संन्यास लेकर एवं श्रीमहाप्रभुजी के प्रेम से आकृष्ट होकर श्रीनवद्वीप को चल पड़े.भगवदिच्छा से श्रीलोकनाथ गोस्वामीजी का श्रीमहाप्रभुजी से द्वितीय मिलन श्रीअद्वैताचार्य के यहॉ ही हुआ.

श्रीमहाप्रभुजी का दर्शन करते ही ये प्रेमावेष में करुण क्रन्दन करते हुए श्रीमहाप्रभुजी के चरणों में गिर पड़े.श्रीमहाप्रभुजी ने इन्हें उठाकर हृदय से लगाया और बहुत प्रकार से धैर्य बधाकर परामर्श दिया कि ,’तुम मेरी बात मानकर श्रीवृन्दावन चले जाओ.वहॉ तुम्हें कुछ समय पर्यन्त परम भागवत श्रीरूप-सनातन, गोपाल भट्ट आदि वैष्णवोंका सत्संग प्राप्त होगा.

अब मैं भी शीघ्र संन्यास लेकर मुक्त हृदय से प्राणिमात्र को भगवन्नाम का वितरण करूंगा.श्री लोकनाथ जी का वृंदावन जानाप्रभु के समझाने से आस्वस्थ होकर श्रीपण्डित गदाधर के प्रिय शिष्य श्रीभूगर्भ गोस्वामीजी को साथ लेकर वृन्दावन को चल पड़े. श्रीवन्दावन पहुच कर इनके मन को परम विश्राम मिला. प्रेम विह्वल चित्त से श्रीराधामाधवकी ललित लीलाओं का चिन्तन एवं सतत नाम स्मरण इनकी सहज साधना थी.

परन्तु यह सब होने पर भी इनका मन श्रीमहाप्रभुजी के चरणों के लिए तड़पता था.जब श्रीमहाप्रभुजी दक्षिण भारत की यात्रा की और श्रीरंगम में श्रीवेंकट भटटजी के यहा चातुर्मास करने के लिए रुके थे, उस समय एक ब्राह्मण से श्रीमहाप्रभुजी का पता पाकर ये उनके दर्शनार्थ श्रीरंगम को चल दिये. वहा पहुचने पर पता चला कि वे तो वहा से प्रस्थान कर चुकेहैं. वहॉ इनका मिलन श्रीगोपाल भट्टजी से हुआ. पुन: जब इन्हें पता चला कि श्रीमहाप्रभुजी श्री वृन्दावन की तरफ गये हैं, ये तत्काल वहॉ से चले और अविश्रान्तभावसे चलते-चलते श्रीवृन्दावन पहुचे.

परन्तु यहॉ आने पर पता चला कि श्रीमहाप्रभुजी यहॉ के तीर्थों का दर्शन कर प्रयाग की ओर प्रस्थान कर गये. इतना करने पर भी इन्हें जब श्रीमहाप्रभुजी का दर्शन नहीं हुआ तो इन्हें अपार मानसिक कष्ट हुआ और इन्होंने संकल्प किया कि या तो प्रयाग जाकर श्रीमहाप्रभुजी का दर्शन करूगा या त्रिवेणी में अपने शरीर का विसर्जन कर दूंगा.उसी दिन, रात्रि में श्रीमहाप्रभुजी ने स्वप्न में आदेशदिया कि,’लोकनाथ! मैं तो सदा तुम्हारे साथ हूँ. तुम अब श्रीवृन्दावन की सीमा से बाहर नहीं जाना.

मैं प्रयाग सेसीधा नीलाचल जाऊॅगा और वहॉ से अपना समाचार देता रहॅूगा.श्रीलोकनाथ गोस्वामीजी ने श्रीमहाप्रभुजी का स्वप्नादेश शिरोधार्य किया और श्रीवृन्दावन वास करने लगे. आगे चलकर श्रीमहाप्रभुजी की प्रेरणा से श्रीरूप-सनातन आदि वैष्णववृन्द श्रीवृन्दावन आये. उनके साहचर्यसे इनकी साधना को बहुत बल मिला.श्री लोकनाथ जी द्वारा श्रीराधाविनोद जी का प्राकट्यएक बार एकान्तवास की इच्छा से ये व्रज के परम पावन स्थान छाता तहसील के उमराव ग्राम में किशोरी कुण्ड पर स्थित तमाल वृक्ष के नीचे रहने लगें.

इनके हार्दिक अनुराग को देखकर भगवान ने एक दिन स्वप्न में इनसे कहा, ‘मैं किशोरी कुण्ड में रह रहा हू. मैं बहुत दिन से भूखा हॅू. मुझे यहॉ से निकालकर मेरी सेवा पूजा करो. निद्रा भंग होने पर ये तिलमिला उठे.प्रात:काल प्रभु के द्वारा प्राप्त निर्देशानुसार इन्होंने किशोरी कुण्ड से श्रीविग्रह को बाहर निकाला और विधिपूर्वक अभिषेक करके श्रीराधाविनोद नाम से ठाकुरजी को स्थापित किया. नित्यप्रति नवीन लाड़ से ठाकुरजी की सेवा करते.इनकी यह दृढ प्रतिज्ञा थी कि ‘मैं शिष्यों का संग्रह नहीं करूंगा और रहने के लिए कुटी नहीं बनाऊॅगा.

फलस्वरूप लता कुन्जों तथा वृक्षों के नीचे ही इनका निवास होता और जहॉ ये रहते वहीं इनके ठाकुरजी भी रहते. वर्षा आदि में ठाकुरजी को वृक्षों के कोटर में छिपा देते और कभी गोद में रखकर स्वयं को उनका आच्छादन बना लेते. इस प्रकार बड़े ही प्रेम पूर्वक श्रीठाकुरजी की आत्मवत सेवा करते थे. आज तो लोग ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं.”श्रीनरोत्तमदास जी”की अपूर्व गुरुसेवा से सन्तुष्ट होकर इन्होंने अपने प्रण को भूलकर उन्हें विधिवत् मंत्र दीक्षा दी थी. श्री नरोत्तमदासजी की लोकोत्तर सेवा-भाव को देखकर श्रीजीवगोस्वामीजी ने उन्हें ‘ठाकुर’की पदवी दी थी. इस प्रकार श्रीलोकनाथ गोस्वामीजी का सम्पूर्ण जीवन सुदृढ़ साधनामय रहा.

आत्म प्रचार से ये इतने दूर रहते थे कि श्रीचैतन्यचरितामृत के रचियता श्रीकृष्णदास कविराजजी जब ग्रन्थ रचना के पूर्व इनकी आज्ञा और आशिर्वाद लेने गये तो इन्होंने अत्यन्त आग्रह पूर्वक कहा कि ग्रन्थ में कहीं भी मेरी चर्चा न की जाय.जब राधा विनोद जी स्वयं रसोई बनाने लगेएकबार श्रीलोकनाथ गोस्वामीजी श्रीराधाकृष्ण के प्रेमरंग में रंगे हुए श्रीराधाबिनोदजी का श्रंगार करके रूपमाधुरी का दर्शन करने में ऐसे खो गये कि शरीर की सुधबुध ही नहीं रही. उधर ठाकुरजी के भोग बनाने में देर हो रही थी. तब ठाकुरजी ही स्वयं इनका रूप धारणकर पाकशाला में जाकर रसोर्इ बनाने लगे.

इतने में एक सेवक दर्शन करने आया. प्रथम वह रसोर्इ का समय जानकर पाकशाला में गया तो वहॉ इनको रसोर्इ बनाते देखा, फिर ठाकुरजी का दर्शन करने गया तो वहॉ इनको ठाकुरजी के दर्शन में बेसुध देखा. सेवक को परम आश्चर्य हुआ. वह अपने मन का विस्मय दूर करने के लिए कर्इ बार मन्दिर में और रसोर्इ में गया परन्तु हर बार उसे दोनो जगह श्रीलोकनाथ गोस्वामीजी ही दिखार्इ दिये.तब उसने मन्दिर में विराजमान श्रीलोकनाथ गोस्वामीजी केचरणों में पड़कर यह विस्मयकारी प्रसंग निवेदन किया. सुनकर ये भी पाकशाला में गये तो सचमुच रसोर्इ बनकर पूर्ण तैयार थी परन्तु अब बनाने वाला वहॉ नहीं था.

श्रीलोकनाथ गोस्वामीजी समझ गये कि वह कोर्इ और नहीं साक्षात् श्रीराधाविनोद ठाकुर जी ही थे.प्रभुकी कृपा विचारकर श्रीलोकनाथ गोस्वामीजी गदगद हो गये. इनकी यह भावदशा देखकर सेवक भी समझ गया कि यह सब प्रभुकी ही लीला थी. जब थोड़ी देर बाद दानेां ठाकुरजी के पास आये तो वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे. ऐसे ही आपके अनेकों चरित्र हैं.नित्य लीला में प्रवेश -विक्रम सम्वत 1645 में श्रावण कृष्णाष्टमी को आपने नित्य निकुंज में प्रवेश किया.

नित्य लीला में ये मंजुलालिमंजरी हैं. जिस प्रकारसखियों में श्रीललिताजी के बाद श्रीविशाखाजी का नाम आता है उसी प्रकार मंजरियों में रूपमंजरी के बाद श्रीमंजुलालिमंजरी को स्मरण किया जाता है. तप्तस्वर्ण के समान इनकी शरीर कान्ति, किंशुक पुष्पके समान लाल वस्त्र तथा श्रीप्रिया प्रीतम के वस्त्रों को सभालकर रखना एवं पहनाना आदि इनकी प्रधान सेवा है.

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BRAJ RAS DHARA 06/11/2018



राधे राधे
🌻🌹आज की “ब्रज रस धारा”🌹🌻
दिनांक 06/11/2018
जन्म -पदमावतीनदी के किनारे पर खेतरी नामकी एक छोटी सी राजधानी है उसी राज्य में स्वामी श्री कृष्णा नंद दत्त मजुमदार के यहाँ नारायणी देवी के गर्भ से ठाकुर नरोत्तमदास जी का जन्महुआ.ये बाल्यकाल से ही विरक्त थे,
घर में अतुल्य ऐश्वर्य था सभी प्रकार के संसारी सुख थे,किन्तु इन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता था.ये वैष्णवो से श्री गौरांग की लीलाओ का श्रवण किया करते थे.
श्री रूप सनातन और रघुनाथ दास जी के वैराग्य और त्याग की कथाएँ सुन सुनकर इनका मन भी राज्य परिवार और धन सम्पति से एकदम फिर गया.लोकनाथ जी सेदीक्षा लेनाश्री गौरांग महाप्रभु और उनके बहुत से पार्षद संसार का परित्याग कर चुके थे,उस समय नरोत्तम बालक थे
इन्हें समझ नहीं आ रहा था कहाँ जाए.एक दिन महाप्रभु ने स्वप्न के आदेश किया – कितुम वृंदावन चले जाओ! और लोकनाथ गोस्वामी के शिष्य बन जाओ,छिपकर वृंदावन चले गए और सारी बातजीव गोस्वामी जी को बताई,वे बोले -लोकनाथ गोस्वामी किसीको भी अपना शिष्य नहीं बनाते.
लोकनाथ और भूगर्भ गोस्वामी दोनों ही महाप्रभु के संन्यास लेने से पूर्व ही उनकी आज्ञा से वृंदावन में आकर चीरघाट पर एक कुंजकुटीर बनाकर भजन करते थे,लोकनाथ जी का वैराग्य भी बड़ा अलौकिक था, वे कभी किसी से व्यर्थ बात नहीं करते प्राय:मौन ही रहते थे,
एकान्त स्थान में चुपचाप भजन करते रहते स्वतः ही जो थोडा बहुत प्राप्त हो गया उसे पा लिया नहीं तो भूखे ही पड़े रहते, शिष्य न बनाने का कठोर नियम कर रखा था.
अब जीव गोस्वामी इन्हें लोकनाथजी के पास ले गए और वैराग्य के बारे में बताया और दीक्षा देने को कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया.परन्तु नरोत्तम ठाकुरजी भी सच्ची श्रद्धा लेकर आये थे.रोज प्रातः लोकनाथ जी यमुना जी में स्नान को जाया करते और दिनभर कुंज कुटीर में भजन करते अब दास ठाकुर जी उनकी छिपकर सेवा करने लगे,जहाँ वे शौच जाते उनकी शौच को उठाकर फेक आते,जिस कंकरीले पथरीले मार्ग से वे यमुना स्नान को जाते उसे साफ कर देते,
उन्हें हाथ धोने के लिए नरम मिट्टी लाकर रख देते.अर्थात जो भी सुख उन्हें सुझता वे कर देते,जब ये सारी बाते लोकनाथ जी को पता चलि तो उनका ह्रदय भर आया और उन्होंने मंत्र दीक्षा दे दी.राधा रानी जीकी मानसी सेवाएक दिन कुंज में मानसी सेवा में चिंतन मगन थे स्वयं श्री जी प्रकट हुई,नरोत्तम मूर्छित हो गए प्रिया जी ने कहा- नरोत्तम! ऐसे काम नहीं चलेगा,
तुमनियमित रूप सेकुछ पक्की सेवा करो,देखो मध्यान में मेरे श्यामसुंदर कोरबड़ी बनाकर मुझे दिया करो,मै उसे अपने श्यामसुंदर कोपवाऊँगी.मेरी सेवा आज भी मेरी एक सखी”चम्पकलता”करतीहै तुम उसके आनुगत्य में यह सेवा करो, अतः तुम्हारा नाम”चम्पक मंजरी”होगा.
(राधारानी जी निज सेवा में जो सखी होती है और उस सखी के अनुगत जो सखी सेवा करती है उसे ‘मंजरी’ कहते है और जिस सखी के अनुगत सखी कार्य करती है उसी के नाम के साथ उसका नाम आता है)इस प्रसंग के साथ श्री नरोत्तम चेतन हुए और आनंद से सराबोर ये श्री गुरुदेव के पास गए और वृत्तान्त उन्हें सुनाया उन्होंने अनुमति दे दी अब ये रबड़ी सेवा करने लगे.
यहाँ सिद्धान्त ये है कि स्वयं ठाकुर जो द्वारा कोई सेवा या सौभाग्य प्राप्त हो तो उसे श्री गुरुदेव से स्वीकृत करना उनका आनुगत्य प्राप्त करना उनकी कृपा प्राप्त करना आवश्यक है.एक दिन आप मानसी सेवा में दूध औट रहे थे, ध्यान प्रिया-प्रियतम की लीला माधुरी में था, दूध उफन गया और फ़ैल कर इनके हाथ पर आ पड़ा, आप चौकन्ने हुए, देखते है तो वास्तव में हाथ पर फफोले पड़ गए, उनकी चिकित्सा कराई,
इसी अवस्थाको”सिद्ध अवस्था”कहते है कि घटना घटे मानसिक सेवा में और प्रभाव दिखे भौतिक शरीर पर.(अर्थात वहाँ न तो कड़ाही है, न दूध है, न आग है, फिर भी सेवा हो रही है, इसे मानसिक सेवा कहते है)जब शरीर दुग्धमय हो गयासमय आने पर आपने शरीर छोड़ दिया कुछ निंदक उलटी सीधी बातकरने लगे इनके शिष्य गंगानारायण ने करूण क्रंदन किया औरप्रार्थना की कि गुरुदेव !
इनका उद्धार कैसे होगा आप कम से कम इन निंदको का उद्धार तो कर जाते,देखते ही शरीर में स्पंदन हुआ और पुन:उठ बैठे और उन निंदको को हरि नाम का उपदेश देकर वैष्णव बनाया.अंतिम समय आने पर आपने एक दिन गंगा स्नान की इच्छा प्रकटकी संकीर्तन सहित आपको आपके शिष्य गंगा तट पर लाये,तट परबैठकर आपको नहलाया गया आपके दोनों शिष्य आपके शरीर को धीरे धीरे मल मल कर धोने लगे और सबके देखते देखते शरीर घुल-घलकर दूध निकल कर गंगा में मिलने लगा और अगले ही क्षण गंगा की लहर आई और वहाँ दूध ही दूध हो गया शरीर का कुछ पता नहीं चला अर्थात शरीर दुग्ध मय होकर गंगा जी मेंमिल गया.

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JAI SHREE RADHE
JAI SHREE KRISHNA

एक बार ऋषि दुर्वासा बरसाने आए।


एक बार ऋषि दुर्वासा बरसाने आए।
 श्री राधारानी अपनी सखियों संग बाल क्रीड़ा में मग्न थी। छोटे छोटे बर्तनों में झूठ मूठ भोजन बनाकर इष्ट भगवान श्री कृष्ण को भोग लगा रही थी।
.ऋषि को देखकर राधारानी और सखियाँ संस्कार वश बड़े प्रेम से उनका स्वागत किया. उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया और बैठने को कहा. 
.ऋषि दुर्वासा भोली भाली छोटी छोटी कन्यायों के प्रेम से बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने जो आसन बिछाया था उसमें बैठ गए।
.जिन ऋषि की सेवा में त्रुटि के भय से त्रिलोकी काँपती है, वही ऋषि दुर्वासा की सेवा राधारानी एवम सखियाँ भोलेपन से सहजता से कर रही हैं। ऋषि केवल उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे।
.सखियाँ कहती है –“महाराज ! आपको पता है हमारी प्यारी राधा न बहुत अच्छे लड्डू बनाती है। हमने भोग अर्पण किया है। अभी  आपको प्रसादी देती हैं।” यह कहकर सखियाँ लड्डू प्रसाद ले आती हैं।
.लड्डू प्रसाद तो है, पर है ब्रजरज का बना, खेल खेल में बनाया गया। ऋषि दुर्वासा उनके भोलेपन से अभिभूत हो जाते हैं।
.हँसकर कहते हैं- “लाली.! प्रसाद पा लूँ ? क्या ये तुमने बनाया है.?”
.सारी सखियाँ कहती हैं- “हाँ हाँ ऋषिवर ! ये राधा ने बनाया है। आज तक ऐसा लड्डू आपने नही खाया होगा।” मुंह में डालते ही परम चकित, शब्द रहित हो जाते हैं।
.एक तो ब्रजरज का स्वाद, दूजा श्री राधा जी के हाथ का स्पर्श लड्डू। “अमृत को फीका करे, ऐसा स्वाद लड्डू का”
.ऋषि की आंखों में आंसू आ जाते हैं। अत्यंत प्रसन्न हो वो राधारानी को पास बुलाते हैं। और बड़े प्रेम से उनके सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं- “बेटी आज से तुम ‘अमृतहस्ता’ हुई।
.दुर्वासा ऋषि बोले –  राधा रानी आप जो बनायोगी वो अमृत के भी अधिक स्वादिष्ट हो जायेगा ।
.जो भी उस दिव्य प्रसाद को पायेगा उसके यश, आयु में वृद्धि होगी उस पर कोई विपत्ति नहीं आएगी, उसकी कीर्ति त्रिलोकी में होगी ।।
.ये बात व्रज में फ़ैल गयी आग की तरह की ऋषि दुर्वासा ने राधा जी को आशीर्वाद दिया ।
.जब मैया यशोदा को जब ये पता चला तो वो तुरंत मैया कीर्तिदा के पास गयी और विनती की आप राधा रानी को रोज हमारे घर नन्द भवन में भोजन बनाने के लिए भेज दिया करे .
.वे दुर्वासा ऋषि के आशीर्वाद से अमृत हस्ता हो गयी है और कंस मेरे पुत्र कृष्ण के अनिष्ठ के लिए हर रोज अनेक असुर भेजता है.
.हमारा मन बहुत चिंतित होता है आपकी बेटी के हाथो से बना हुआ प्रसाद पायेगा तो उनका अनिष्ठ नहीं हो उसकी बल, बुद्धि, आयु में वृद्धि होगी.
.फिर कीर्तिजा मैय्या ने श्री राधा रानी जी से कहा – आप यसोदा मैया की इच्छा पूर्ति के लिए प्रति दिन नन्द गाँव जाकर भोजन बनाया करो.
.उनकी आज्ञा पाकर श्री राधा रानी रोज  कृष्ण के भोजन प्रसादी बनाने के लिए नन्द गाँव जाने लगी.।

🏵🏵🏵🏵जय जय श्री राधेकृष्ण जी।🏵🏵🏵🏵

एक निर्धन जुलाहा


एक गांव में एक निर्धन जुलाहा दम्पत्ति रहता था। जुलाहे के नाम था सुन्दर और उसकी पत्नी का नाम था लीला। 
दोनों पति-पत्नी अत्यंत परिश्रमी थे। सारा दिन परिश्रम करते सुन्दर-सुन्दर कपड़े बनाते, किन्तु उनको उनके बनाए वस्त्रों की अधिक कीमत नहीं मिल पाती थी। 
दोनों ही अत्यन्त संतोषी स्वाभाव के थे जो मिलता उसी से संतुष्ट हो कर एक टूटी-फूटी झोपडी में रहकर अपना जीवन-निर्वाह कर लेते थे। 
वह दोनों भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे, दिन भर के परिश्रम के बाद जो भी समय मिलता उसे  दोनों भगवान के भजन-कीर्तन में व्यतीत करते।
सुन्दर बाबा के पास एक तानपुरा और एक खड़ताल थी, जब दोनों मिलकर भजन गाते तो सुन्दर तानपुरा बजाता और लीला खड़ताल, फिर तो दोनों भगवान के भजन के ऐसा खो जाते की उनको अपनी भूख-प्यास की चिंता भी नहीं रहती थे। 
यूं तो दोनों संतोषी स्वाभाव के थे, अपनी दीन-हीन अवस्था के लिए उन्होंने कभी भगवान् को भी कोई उल्हाना नही दिया और अपने इसी जीवन में प्रसन्न थे किन्तु ...
एक दुःख उनको सदा कचोटता रहता था, उनके कोई संतान नहीं थी। इसको लेकर वह सदा चिंतित रहा करते थे, किन्तु रहते थे फिर भी सदा भगवान में मग्न, इसको भी उन्होंने भगवान की लीला समझ कर स्वीकार कर लिया और निष्काम रूप से श्री कृष्ण के प्रेम-भक्ति में डूबे रहते। 
जब उनकी आयु अधिक होने लगी तो एक दिन लीला ने सुन्दर से कहा कि हमारी कोई संतान नहीं  है, कहते है की संतान के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती, अब हमारी आयु भी अधिक को चली है, ना जाने कब बुलावा आ जाए, मरने की बाद कौन हमारी चिता को अग्नि देगा और कौन हमारे लिए तर्पण आदि का कार्य करेगा, कैसे हमारी मुक्ति होगी। 
सुन्दर बोला तू क्यों चिंता करती है, ठाकुर जी है ना वही सब देखेंगे। सुन्दर ने यह बात कह तो दी किन्तु वह भी चिंता में डूब गया, 
तभी उसके मन में एक विचार आया वह नगर में गया और श्री कृष्ण के बाल गोपाल रूप की एक प्रतिमा ले आया। घर आ कर बोला अब तुझे चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है मैं यह बाल गोपाल लेकर आया हूँ,
हमारे कोई संतान नहीं तो वह भी इन्ही की तो लीला है, हम इनको ही अपने पुत्र के समान प्रेम करेंगे, यही हमारे पुत्र का दायित्व पूर्ण करेंगे यही हमारी मुक्ति करेंगे। 
सुन्दर की बात सुन कर लीला अत्यंत प्रसन्न हुई, उसने बाल गोपाल को लेकर अपने हृदय से लगा लिया और बोली आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं, आज से यही हमारा लल्ला है। 
दोनों पति-पत्नी ने घर में एक कोना साफ़ करके स्थान बनाया और एक चौकी पर बाल गोपाल को विराजित कर दिया। 
तब से जुलाहा दंपत्ति का नियम हो गया वह प्रतिदिन बाल गोपाल को स्नान कराते उनको धुले वस्त्र पहनाते अपनी संतान की तरह उनको लाड-लडाते, उन्ही के सामने बैठ कर भजन कीर्तन करते और वहीं सो जाते। .
जुलाहा अपने हाथ से बाल गोपाल के लिए सुन्दर वस्त्र बनाता और उनको पहनता इसमें उसको बड़ा आनदं आता। धीरे-धीरे दोनों बाल गोपाल को अपनी संतान के समान ही प्रेम करने लगे। 
लीला का नियम था की वह प्रति दिन अपने हाथ से अपने लल्ला को भोजन कराती तब स्वयं भोजन करती, लल्ला को भोजन कराते समय उसको ऐसा ही प्रतीत होता मानो अपने पुत्र को ही भोजन करा रही हो। 
उन दोनों के निश्चल प्रेम को देख कर करुणा निधान भगवान् अत्यन्त्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अदृश्य रूप में आकर स्वयं भोजन खाना आरम्भ कर दिया,
लीला जब प्रेम पूर्वक बाल गोपाल को भोजन कराती तो भगवान् को प्रतीत होता मानो वह अपनी माँ के हाथो से भोजन कर रहें हैं, उनको लीला के हाथ से प्रेम पूर्वक मिलने वाले हर कौर में माँ का प्रेम प्राप्त होता था, 
लीलाधारी भगवान श्री कृष्ण स्वयं माँ की उस प्रेम लीला के वशीभूत हो गए। किन्तु लीला कभी नहीं जान पाई कि स्वयं बाल-गोपाल उसके हाथ से भोजन करते हैं। 
एक दिन कार्य बहुत अधिक होने के कारण लीला बाल गोपाल को भोजन कराना भूल गई। 
गर्मी का समय था भरी दोपहरी में दोनों पति-पत्नी कार्य करते-करते थक गए और बिना भोजन किए ही सो गए, उनको सोए हुए कुछ ही देर हुई थी कि उनको एक आवाज सुनाई दी.. माँ-बाबा मुझको भूख लगी है
दोनों हड़बड़ा कर उठ गए, चारो और देखा आवाज कहाँ से आई है, किन्तु कुछ दिखाई नहीं दिया। 
तभी लीला को स्मरण हुआ की उसने अपने लल्ला को भोजन नहीं कराया, वह दौड़ कर लल्ला के पास पहुंची तो देखा की बाल गोपाल का मुख कुम्हलाया हुआ है, 
इतना देखते ही दोनों पति-पत्नी वहीं उनके चरणो में गिर पड़े, दोनों की आँखों से आसुओं की धार बह निकली, 
लीला तुरंत भोजन लेकर आई और  ना जाने कैसा प्रेम उमड़ा की लल्ला को उठा कर अपनी गोद में बैठा लिया और भोजन कराने लगी, दोनों पति-पत्नी रोते जाते और लल्ला को भोजन कराते जाते, साथ ही बार-बार उनसे अपने अपराध के लिए क्षमा मांगे जाते, .
ऐसा प्रगाढ़ प्रेम देख कर भगवान अत्यंत द्रवित हुए और अन्तर्यामी भगवान श्रीहरि साक्षात् रूप में प्रकट हो गए। 
भगवान् ने अपने हाथों से अपने रोते हुए माता-पिता की आँखों से आंसू पोंछे और बोले "प्रिय भक्त में तुम्हारी भक्ति और प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहो वर माँग लो मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करूँगा” .
इतना सुनते ही दोनों भगवान के चरणो में गिर पड़े और बोले "दया निधान आप हमसे प्रसन्न हैं और स्वयं हमारे सम्मुख उपस्थित है, हमारा जीवन धन्य हो गया, इससे अधिक और क्या चाहिए, 
इससे अधिक किसी भी वस्तु का भला क्या महत्त्व हो सकता है, आपकी कृपा हम पर बनी रहे बस इतनी कृपा करें" 
श्रीहरि बोले “यदि तुम चाहो तो में तुम्हारे जीवन में संतान के आभाव को समाप्त कर के तुम्हे एक सुन्दर संतान प्रदान करूँगा"
यह सुनते ही सुन्दर और लीला एकदम व्याकुल होकर बोले "नही भगवन् हमको संतान नहीं चाहिये" 
उनका उत्तर सुनकर भगवान ने पूंछा "किन्तु क्यों ! अपने जीवन में संतान की कमी को पूर्ण करने के लिए ही तो तुम मुझ को अपने घर लेकर आये थे "
यह सुनकर वह दोनों बोले प्रभु हमको भय है कि यदि हमको संतान प्राप्त हो गई तो हमारा मोह उस संतान के प्रति बढ जाएगा और तब हम आपकी सेवा नहीं कर पाएंगे"
उनका प्रेम और भक्ति से भरा उत्तर सुनकर करुणा निधान भगवान् करुणा से भर उठे, स्वयं भगवान् की आँखों से आँसू टपक पड़े वह बोले, 
"हे मैया, बाबा मैं यहाँ आया था आपके ऋण को उतारने के लिए किन्तु आपने तो मुझको सदा-सदा के लिए अपना ऋणी बना लिया, 
मैंआपके प्रेम का यह ऋण कभी नहीं उतार पाउँगा, मैं सदा-सदा तुम दोनों का ऋणी रहूँगा, मैं तुम्हारे प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हूँ तुमने अपने निर्मल प्रेम से मुझको भी अपने बंधन में बांध लिया है. 
मैं तुमको वचन देता हूँ कि आज से मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में तुम्हारे समस्त कार्य पूर्ण  करूँगा तुमको कभी संतान का आभाव नहीं होने दूंगा" ऐसा कह कर भक्तवत्सल भगवान् बाल गोपाल की प्रतिमा में विलीन हो गए।
उस दिन से सुन्दर और लीला का जीवन बिल्कुल ही बदल गया उन्होंने सारा काम-धंधा छोड़ दिया और सारा दिन बाल गोपाल के भजन-कीर्तन और उनकी सेवा में व्यतीत करने लगे। 
उनको ना भूख-सताती थी ना प्यास लगती थी, सभी प्रकार की इच्छाओं का उन्होंने पूर्ण रूप से त्याग कर दिया, 
सुन्दर कभी कोई कार्य करता तो केवल अपने बाल गोपाल के लिए सुन्दर-सुन्दर वस्त्र बनाने का। उनके सामने जब भी कोई परेशानी आती बाल गोपाल तुरंत ही एक बालक के रूप में उपस्तिथ हो जाते और उनके समस्त कार्य पूर्ण करते । 
वह दंपत्ति और बालक गांव भर में चर्चा का विषय बन गए, किन्तु गाँव में कोई भी यह नहीं जान पाया की वह बालक कौन है, कहाँ से आता है, और कहाँ चला जाता है। 
धीरे-धीरे समय बीतने लगा, जुलाह दंपत्ति बूढ़े हो गए, किन्तु भगवान की कृपा उन पर बनी रही, अब दोनों की आयु पूर्ण होने का समय आ चला था भगवत प्रेरणा से उनको यह ज्ञात हो गया की अब उनका समय पूरा होने वाला है, 
एक दिन दोनों ने भगवान को पुकारा ठाकुर जी तुरंत प्रकट हो गए और उनसे उनकी इच्छा जाननी चाही, दोनों भक्त दम्पत्ति भगवान के चरणो में प्रणाम करके बोले ....
"है नाथ हमने अपने पूरे जीवन में आपसे कभी कुछ नहीं माँगा, अब जीवन का अंतिम अमय आ गया है, इसलिए आपसे कुछ मांगना चाहते हैं"
भगवान बोले "निःसंकोच अपनी कोई भी इच्छा कहो मैं वचन देता हूँ कि तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा"
तब बाल गोपाल के अगाध प्रेम में डूबे उस वृद्ध दम्पति बोले "हे नाथ हमने अपने पुत्र के रूप में आपको देखा, और आपकी सेवा की आपने भी पुत्र के समान ही हमारी सेवा करी अब वह समय आ गया है जिसके लिए कोई भी माता-पिता पुत्र की कामना करते हैं, 
है दीनबंधु हमारी इच्छा है की हम दोनों पति-पत्नी के प्राण एक साथ निकले और है दया निधान जिस प्रकार एक पुत्र अपने माता-पिता की अंतिम क्रिया करता है, और उनको मुक्ति प्रदान करता है, उसी प्रकार है परमेश्वर हमारी अंतिम क्रिया आप अपने हाथो से करें और हमको मुक्ति प्रदान करें"
श्रीहरि ने दोनों को उनकी इच्छा पूर्ण करने का वचन दिया और बाल गोपाल के विग्रह में विलीन हो गए।
अंत में वह दिन आ पहुंचा जब प्रत्येक जीव को यह शरीर छोड़ना पड़ता है, दोनों वृद्ध दम्पति बीमार पड़ गए, उन दोनों की भक्ति की चर्चा गांव भर में थी इसलिए गांव के लोग उनका हाल जानने उनकी झोपडी पर पहुंचे, 
किन्तु उन दोनों का ध्यान तो श्रीहरि में रम चुका था उनको नही पता कि कोई आया भी है, नियत समय पर एक चमत्कार हुआ जुलाहे की झोपड़ी एक तीव्र और आलौकिक प्रकाश से भर उठी।
वहां उपस्थित समस्त लोगो की आँखे बंद हो गई, किसी को कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था, कुछ लोग तो झोपडी से बाहर आ गए कुछ वही धरती पर बैठ गए।
श्री हरी आपने दिव्य चतर्भुज रूप में प्रकट हुए, उनकी अप्रितम शोभा समस्त सृष्टि को आलौकित करने वाली थी, वातावरण में एक दिव्य सुगंध भर गई, 
अपनी मंद-मंद मुस्कान से अपने उन भक्त माता-पिता की और देखते रहे, उनका यह दिव्य रूप देख कर दोनों वृद्ध अत्यंत आनंदित हुए, 
अपने दिव्य दर्शनों से दोनों को तृप्त करने के बाद करुणा निधान, लीलाधारी, समस्त सृष्टि के पालन हार श्री हरी, वही उन दोनों के निकट धरती पर ही उनके सिरहाने बैठ गए, 
भगवान् ने उन दोनों भक्तों का सर अपनी गोद में रखा, उनके शीश पर प्रेम पूर्वक अपना हाथ रखा, तत्पश्चात अपने हाथो से उनके नेत्र बंद कर दिए, 
तत्काल ही दोनों के प्राण निकल कर श्री हरी में विलीन हो गए, पंचभूतों से बना शरीर पंच भूतो में विलीन हो गया।
कुछ समय बाद जब वह दिव्य प्रकाश का लोप हुआ तो सभी उपस्थित ग्रामीणो ने देखा की वहां ना तो सुन्दर था, ना ही लीला थी और ना ही बाल गोपाल थे। 
शेष थे तो मात्र कुछ पुष्प जो धरती पर पड़े थे और एक दिव्य सुगंध जो वातावरण में चहुं और फैली थी। विस्मित ग्रामीणो ने श्रद्धा से उस धरती को नमन किया, 
उन पुष्पों को उठा कर शीश से लगाया तथा सुंदर, लीला की भक्ति और गोविन्द के नाम का गुणगान करते हुए चल दिए उन पुष्पों के श्री गंगा जी में विसर्जित करने के लिए।
मित्रो...भक्त वह है जो एक क्षण के लिए भी विभक्त नहीं होता, अर्थात जिसका चित्त ईश्वर में अखंड बना रहे वह भक्त कहलाता है। सरल शब्दों में भक्ति के अंतिम चरण का अनुभव करने वाले को भक्त कहते हैं ।

  जय जय श्री राधे