AJA EKADASHI VRAT KATHA





अजा एकादशी की व्रत कथा 06/09/2018


भाद्रपद की कृष्णपक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहते है। इस बार यह एकादशी 6 सितंबर गुरुवार के दिन है। हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से हर महीने 2 एकादशियां आती हैं। हर एकादशी का अपना अलग महत्व होता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का महत्व विशेष होता है। इस एकादशी के बारे में ऐसी मान्यता है कि राजा हरिश्चन्द को अपना खोया हुआ परिवार और राज-पाठ वापस मिल गया था। आइए जानते हैं कि अजा एकादशी की व्रत कथा।

भगवान राम के वंश में हरिश्चन्द्र नाम के एक राजा हुए थे। राजा अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। एक बार देवताओं ने इनकी परीक्षा लेने की योजना बनाई। जिसके तहत राजा ने स्वप्न में देखा कि ऋषि विश्वामित्र को उन्होंने अपना सम्पूर्ण राजपाट दान कर दिया है। जब अगले दिन राजा हरिश्चन्द्र विश्वामित्र को अपना समस्त राज-पाठ सौंप कर जाने लगे तभी विश्वामित्र ने राजा हरिश्चन्द्र से दक्षिणा स्वरुप 500 स्वर्ण मुद्राएं दान में मांगी। राजा ने उनसे कहा कि पांच सौ क्या, आप जितनी चाहे स्वर्ण मुद्राएं ले लीजिए। इस पर विश्वामित्र हंसने लगे और राजा को याद दिलाया कि राजपाट के साथ राज्य का कोष भी वे दान कर चुके हैं और दान की हुई वस्तु को दोबारा दान नहीं किया जाता। तब राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेचकर स्वर्ण मुद्राएं हासिल की, लेकिन वो भी पांच सौ नहीं हो पाईं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को भी बेच डाला और सोने की सभी मुद्राएं विश्वामित्र को दान में दे दी। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को जहां बेचा था वह श्मशान का चांडाल था। चांडाल ने राजा हरिश्चन्द्र को श्मशान भूमि में दाह संस्कार के लिए कर वसूली का काम दे दिया। 

एक दिन राजा हरिश्चंद्र ने एकादशी का व्रत रखा हुआ था। आधी रात का समय था और राजा श्मशान के द्वार पर पहरा दे रहे थे। बेहद अंधेरा था, इतने में ही वहां एक लाचार और निर्धन स्त्री बिलखते हुए पहुंची जिसके हाथ में अपने पुत्र का शव था।राजा हरिश्चन्द्र ने सत्यधर्म का पालन करते हुए पत्नी से भी पुत्र के दाह संस्कार के लिए भी कर मांगा। पत्नी के पास कर चुकाने के लिए धन नहीं था इसलिए उसने अपनी सारी का आधा हिस्सा फाड़कर राजा का दे दिया।

उसी समय भगवान प्रकट हुए और उन्होंने राजा से कहा तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है। तुम्हारी कर्त्तव्यनिष्ठा महान है, तुम इतिहास में अमर रहोगे। इतने में ही राजा का बेटा रोहिताश्व जीवित हो उठा। ईश्वर की अनुमति से विश्वामित्र ने भी हरिश्चंद्र का राजपाठ उन्हें वापस लौटा दिया।

TODAY’S BRAJ RAS DHARA ON 06/09/2018



🍁🌺आज की “ब्रज रस धारा”🌺🍁
दिनांक 06/09/2018
श्री सनातन गोस्वामी का जन्म सं. 1523 के लगभग हुआ था सनातन गोस्वामी जी को संस्कृत के साथ फारसी अरबी की भी अच्छी शिक्षा पाई थी.सन् 1483 ई. में पिता मह की मृत्यु पर अठारह वर्ष की अवस्था में यह उन्हीं के पद पर नियत किए गए और बड़ी योग्यता से कार्य सँभाल लिया.
हुसेन शाह के समय में यह प्रधान मंत्री हो गए तथा इन्हें दरबारे खास उपाधि मिली.गोस्वामी जी तीन भाई थे, सबसे बड़े”सनातन जी”ही थे, फिर”रूप गोस्वामी”और सबसे छोटे’अनूप गोस्वामी जी”थे. तीनो भाई राज कार्य में लगे रहते थे. थे तो ब्राह्मण कुलके परन्तु हुसेन शाह के यहाँ काम करते करते उसके जैसा ही रहन सहन हो गया था.श्री चैतन्य महाप्रभु का जब प्रकाश हुआ तब यह भी उनके दर्शन के लिए उतावले हुए, पर राजकार्य से छुट्टी नहीं मिली.
इसलिए उन्हें पत्र लिखकर रामकेलि ग्राम में आने का आग्रह किया.श्री चैतन्य जब वृंदावन जाते समय रामकेलि ग्राम में आए तब इन तीनों भाइयों ने उनके दर्शन किएऔर सभी ने सांसारिक जंजाल से मुक्तिपाने का दृढ़ संकल्प किया.सभी राजपद पर थे.पर सनातन इनमें सबसे बड़े और मंत्रीपद पर थे
अत: पहले श्री रूप तथा अनुपम सारे कुटुंब को स्वजन्मस्थान फतेहाबाद में सुरक्षित रख आए और रामकेलि ग्राम में सनतान जी के लिए कुसमय में काम आने को कुछ धन एक विश्वसनीय पुरुष के पास रखकर वृंदावन की ओर चले गए.जब सनातन जी ने राजकार्य से हटने का प्रयत्न किया तब नवाब ने इन्हें कारागार में बंद करा दिया.अंत में घूस देकर यह बंदीगृह से भागे और काशी पहुँच गए.स. 1572 में यहीं श्रीगौरांग से भेंट हुई और दो मास तक वैष्णव भक्ति शास्त्र पर उपदेश देकर इन्हें वृंदावन भेज दिया कि वहाँ के लुप्त तीर्थों का उद्धार, भक्तिशास्त्र की रचना तथा प्रेमभक्ति एवं संकीर्तन का प्रचार करें.
यहाँ से वृंदावन चले गए पर कुछ दिनों बाद श्रीगौरांग के दर्शन की प्रबल इच्छा से जगन्नाथपुरी की यात्रा की.वहाँ कभी जगन्नाथ भगवान के दर्शन करने नहीं जाते थे,उनकाऐसा मानना था कि यवनों के संसर्ग से हम दूषित हो गए है,जगन्नाथ जी के मंदिर के पास भी कही कोई भक्त हम से स्पर्श न कर जाए,इसलिए मंदिर दूर से ही मंदिर कि धवजा के दर्शन कर लिया करते थे,कुछ दिन रहकर यह पुन: वृंदावन लौट आए.
“श्री सनातन गोस्वामी जी”जब वृंदावन आये और द्वादश टीला जो कलिदेह के निकट है वही पर एक कुटिया में निवास करते थे उस समयवृंदावन घोर जंगल के रूप में परिणित हो गया यहाँ किसी गृहस्थ का वास नहीं था.अतः सनातन जी मथुरासे भिक्षा माँग कर लाते थे श्री सनातन जी प्रातः काल वृंदावन से सोलह मील चलकर चौदह मील गोवर्धन की परिक्रमाकरते थे वहाँ से सोलह मील चलकर मथुरा में मधुकरी करते औरपुन:वृंदावन में अपनी भजन कुटी पर लौट आते.सनातन जी का मदनमोहन को चौबाईन के घर से लाना
प्रसंग  १. -एक दिन मथुरा में एक चौबे के घर में श्री सनातन जी ने श्यामकांति वाले मदन नामक बालक को देखा, जो चौबे के घर में स्थित मंदिर से निकलकर चौबे के बालक के साथ गुल्ली डंडा खेल रहे थे. उन श्याम कांति वाले मदन बालक ने चौबाईन के बालक को पराजित कर दिया, मदन ने पराजित चौबे बालक के कंधे पर बैठकर घोड़े क का आनंद लिया.किन्तु दूसरी बार पराजित होने पर जब मदन के कंधे पर, चौबे बालक को चढ़ने की बारी आई तो मदन भागकर मंदिर में प्रवेश कर गया.
ऐसा देखकर चौबे का बालक क्रोध से गली देता हुआ उसके पीछे दौड़ा, वह मंदिर में प्रवेश करना चाहता था किन्तु पुजारी जी ने उसे डाट-डपटकर भगा दिया, अतः विग्रह बने मदन को दूर से ही तर्जनी अँगुली दिखाते हुए चौबे बालक ने कहा – अच्छा कल तुझे देख लूँगा.श्री सनातन जी इस द्रश्य को देखकर आश्चर्य चकित रह गए दूसरे दिन वे कुछ पहले ही दर्शनों की पिपासा लेकर पहुँच गए कलेवे का समय था अतः चौबाईन दोनों बालको के कलेबे के लिए खिचड़ी पका रही थी, अभी उसने स्नान आदि नहीं किया था दोनों बालक कलेवे की प्रतीक्षा कर रहे थे. मैया दातुन करती जा रही थी और उसके दूसरे सिरे से खिचड़ी को भी चलाती जा रही थी. खिचड़ी पक जाने पर कटोरी में गर्म-गर्म खिचड़ी बालको के सामने रखकर फूँक कर उसे ठंडा भी करने लगी. और दोनों बालको ने बड़े प्रेम से खिचड़ी का रसास्वादन करने लगे.सनातनजी से ये चौबाईन का अनाचार सहन नहीं हुआ उन्होंने कहा – माई! इन बालको को बिना स्नान किये दातुन से खिचड़ीचलाकर अपवित्र कलेवा देना उचित नहीं है,
चौबा ईन अपनी भूल समझ गई. बोली – बाबा कल से शुद्ध रूप से बनाकर ही दूँगी.सनातन जी तो रोज ही मधुकरी के लिए आते थे तीसरे दिन फिर पहुच गए तो देखा की माई के स्नान पूजन में विलम्ब के कारण दोनों बालक भूख लगने के कारण कलेबा के लिए मचल रहे है. माँ बर्तन धोकर खिचड़ी पका रही है. दोनों उसके वस्त्र पकड़कर मचल रहे थे.तब सनातन जी ने फिर कहा – माई! आपको स्नान करने की कोई आवश्यकता नहीं है आप पूर्ववत ही बनाये .मैंने आपके चरणों का अपराध किया है, उस बालक के दर्शन हेतु सनातन जी नियम से चौबे के घर आने लगे,और घंटो खड़े उसे देखते और रोते रहते.एक दिन रात में स्वप्न में श्री मदनमोहन जी ने श्री सनातन जी से कहा – कि तुम मुझे मथुरा से यहाँ ले आओ, और उधर चौबाईन को भी स्वप्न में कहा – कि मुझे उन बाबा को दे देना,अगले दिन चौबाईन ने मदनमोहन जी को श्री सनातन जी कोसौप दिया. बोली ये तो बहुत छलिया है जिस यशोदा ने इतना लाड लड़ाया उसे ही छोडकर मथुरा चला गया. इसका कोई सगा नहीं है, इसे मेरी चाह नहीं है तो मै भी क्यों इसके लिए मरू,जाये मेरी बला से, इस तरह प्रेम में रोष करने लगी. बाहर से तो गुस्सा दिखा रही थी और अन्दर से प्रेम के कारण आँसू निकल रहे थे,श्री सनातन जी भिक्षा के द्वारा प्राप्त आटे से अलौनी बाटी बनाकर अपने मदन मोहन का भोग लगाकर खुद पाते थे एक दिन मदन मोहन जी ने कहा बोले – बाबा ये अलौनी बाटी मेरे गले के नीचे नहीं उतरती थोडा सा नमक क्यों नहीं डालते सनातन जी बोले नमक कहा से लाऊ ?बोले मधुकरी मागकर लाते हो वही से, अब सनातन जी नमक लगाकर बाटी बनाने लगे.अब कुछ दिनों बाद मदनमोहन जी फिर बोले –बाबा ये बिना घी कि बाटी हमसे नहीं खायी जाती अब तो सनातन जी बोले – देखो मै ठहरा वैरागी, अगर इतना ही स्वादिष्ट भोजन करना चाहते थे तो किसी सेठ के पास क्यों नहीं गए यहाँ तो ऐसे ही मिलेगा, कभी कहते हो नमक नही, कभी कहते हो घी नहीं, कल ५६ भोग मांगोगे, कहा से लाऊंगा ? अपनी व्यवस्था स्वयं कर लो.
प्रसंग २-एक दिन पंजाब में मुल्तान का रामदास खत्री – जो कपूरी नाम से अधिक जाना जाता था, आगरा जाता हुआ व्यापार के माल से भरी नाव लेकर जमुना में आया किन्तु कालीदह घाट के पास रेतीले तट पर नाव अटक गयी. तीन दिनों तक निकालने के असफल प्रयासों के बाद वह स्थानीय देवता को खोजने और सहायता माँगने लगा. वह किनारे पर आकर पहाड़ीपर चढ़ा. वहाँ उसे सनातन मिले. और सारा वृतांत कहा.सनातन जी बोले -मै तो एक संन्यासी हूँ क्या कर सकता हूँ अन्दर मदन मोहन जी है उनसे प्रार्थना करो व्यापारी से मदनमोहन से प्रार्थना करने लगा,और तत्काल नाव तैरने लग गई. जब वह आगरे से माल बेचकर लौटा तो उसने सारा पैसा सनातन को अर्पण कर दिया और उससे वहाँ मंदिर बनाने की विनती की. मंदिर बन गया और लाल पत्थर का घाट भी बना .भगवान के चरण चिन्ह अंकित गोवर्धन शिलासनातन गोस्वामी का नियम था गिरि गोवर्द्धन की नित्य परिक्रमा करना. अब उनकी अवस्था 90 वर्ष की हो गयी थी. नियम पालन मुश्किल हो गया था. फिर भी वे किसी प्रकार निबाहे जा रहे थे. तब श्री मदन मोहन जी को दया आई और छोटे से बालक के रूप में प्रकट होकर कहने लगे.-सनातन, तुम्हारा कष्ट मुझसे नहीं देखा जाता. तुम गिरिराजपरिक्रमा का अपना नियम नहीं छोड़ना चाहते तो इस गिरिराजशिला की परिक्रमा कर लिया करो. इस पर मेरा चरण-चिन्ह अंकित है. इसकी परिक्रमा करने से तुम्हारी गिरिराज परिक्रमा हो जाया करेगी.”इतना कह मदनगोपाल अन्तर्धान हो गये. सनातन गोस्वामी मदनगोपाल-चरणान्कित उस शिला को भक्तिपूर्वक सिर पर रखकरअपनी कुटिया में गये. उसका अभिषेक किया और नित्य उसकी परिक्रमा करने लगे. आज भी मदगोपाल के चरणचिन्हयुक्त वह शिला वृन्दावन में श्रीराधादामोदर के मन्दिर में विद्यमान हैं,ऐसी मान्यता है कि राधा दामोदर मंदिर की चार परिक्रमा लगाने पर गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा का फल मिल जाता है.आज भी कार्तिक सेवा में श्रद्धालु बड़े भाव से मंदिर की परिक्रमा करते है.

TODAY’S BRAJ RAS DHARA ON 04/09/2018



🍃🍁आज की “ब्रज रस धारा”🍁🍃
दिनांक 04/09/2018
श्री कृष्णदासजी की व्रजरज् में बहुत निष्ठा थी. कृष्णदास जी सदा ही उसे धारण किये रहते थे.एक बार इनके गुरुने इन्हें किसी कारण वश इन्हें त्याग दिया,एक बार ये दिल्ली गए वहाँ एक मिठाई वाला उत्तम गरम-गरम जलेबियाँ निकाल रहाथा.जलेबियाँ देखकर मन ही मन श्री नाथ जी को (मानसी) भोग लगाया.और प्रेम के ग्राहक श्री ठाकुर जी ने स्वीकार कर ली.
यहाँ श्री नाथ जी को बाहर का भोग नहीं लगता,जब गोसाई जी नेदेखा जलेबियो का थार कहाँ से आ गया, तो श्री नाथ जी से बोले – आप बड़े चटोरे हो जलेबियाँ खानी थी तो हमसे कहते हमने उसे त्याग दिया और आप जलेबियाँ खाने पहुँच गए.श्री नाथ जी बोले -आपगुरु हो अंगीकार भी कर सकते हो और त्याग भी कर सकते हो, किन्तु मै तो जीव को केवल अंगीकार करना ही जानता हूँ,और एक बार आपने उसका हाथ मेरे हाथ में दे दिया.आप छोड़ सकते हो मै नही छोड़ सकता.गुरु जी ठाकुर जी से लिपट कर रोने लगे,नाथ जब तुम नहीं छोड़ सकते तो हम कैसे छोड़ सकता हूँ.और फिर कृष्णदास जी को स्वीकार कर लिया.
प्रसंग 2 -एक बार एक वारमुखी का राग सुनकर कृष्णदास जी उसके पास गए और अनुराग वश उससे पूछने लगे -हे चन्द्र मुखी! मेरे शशि मुख लाला राग का बड़ा रसिक है तुम उसको राग गान सुनाने के लिए मेरे साथ चलोगी ?उसने सोचा होगा कोई रसिक मुझे क्या मेरा काम तो रिझाना है बोली -हाँ चलूंगी.कृष्णदास जी लोक की लज्जा छोड़कर उस वारमुखी को अपने साथ व्रज में लाए,उस वारमुखी को भली भांति स्नान करवा वसन भूषण पहना कर श्रृंगार करा सुगंध लगा उसे श्री नाथ जी के मंदिर में लाकर ठाकुर जी के सामने खड़ी कर आज्ञा की कि मनुष्यों को बहुत रिझाया अब तेरा भाग्य चमका हमारे लाल जी को रिझा.उस वारमुखी ने जैसे ही श्रीनाथ जी के दर्शन किया प्रेम में मतवाली होकर नाचने लगी.
कृष्णदास जी ने उससे पूँछा -मेरे लाल को तूने देखा है ?उसने उत्तर दिया -कि केवल देखा ही नहीं वरन इनकी सौंदर्य पर अपना तन मन भी वार चुकी.उसने गाया, नाचा, भाव बताया, अपनी सब कलाओं प्रकटकर ठाकुरजी को रिझा लिया.तदाकार हो गई, सबको प्रेमरंग में भीगा दिया. शरीर उसी दशा में छोड़कर परम पद को पहुँच गई.

Introduction of Braj

ब्रज का परिचय / Introduction of Braj

ब्रज शब्द का काल-क्रमानुसार अर्थ विकास हुआ है। वेदों और रामायण-महाभारत के काल में जहाँ इसका प्रयोग ‘गोष्ठ’-‘गो-स्थान’ जैसे लघु स्थल के लिये होता था। वहाँ पौराणिक काल में ‘गोप-बस्ती’ जैसे कुछ बड़े स्थान के लिये किया जाने लगा। उस समय तक यह शब्द प्रदेशवायी न होकर क्षेत्रवायी ही था।
भागवत में ‘ब्रज’ क्षेत्रवायी अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। वहाँ इसे एक छोटे ग्राम की संज्ञा दी गई है। उसमें ‘पुर’ से छोटा ‘ग्राम’ और उससे भी छोटी बस्ती को ‘ब्रज’ कहा गया है। 16वीं शताब्दी में ‘ब्रज’ प्रदेशवायी होकर ‘ब्रजमंडल’ हो गया और तब उसका आकार 84 कोस का माना जाने लगा था। उस समय मथुरा नगर ‘ब्रज’ में सम्मिलित नहीं माना जाता था। सूरदास तथा अन्य ब्रजभाषा कवियों ने ‘ब्रज’ और मथुरा का पृथक रुप में ही कथन किया है। कृष्ण उपासक सम्प्रदायों और ब्रजभाषा कवियों के कारण जब ब्रज संस्कृति और ब्रजभाषा का क्षेत्र विस्तृत हुआ तब ब्रज का आकार भी सुविस्तृत हो गया था। उस समय मथुरा नगर ही नहीं, बल्कि उससे दूर-दूर के भू-भाग, जो ब्रज संस्कृति और ब्रज-भाषा से प्रभावित थे, व्रज अन्तर्गत मान लिये गये थे। वर्तमान काल में मथुरा नगर सहित मथुरा ज़िले का अधिकांश भाग तथा राजस्थान के डीग और कामवन का कुछ भाग, जहाँ से ब्रजयात्रा गुजरती है, ब्रज कहा जाता है। ब्रज संस्कृति और ब्रज भाषा का क्षेत्र और भी विस्तृत है।
उक्त समस्त भू-भाग के प्राचीन नाम, मधुबन, शूरसेन, मधुरा, मधुपुरी, मथुरा और मथुरा मंडल थे तथा आधुनिक नाम ब्रज या ब्रजमंडल हैं। यद्यपि इनके अर्थ-बोध और आकार-प्रकार में समय-समय पर अन्तर होता रहा है। इस भू-भाग की धार्मिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक और संस्कृतिक परंपरा अत्यन्त गौरवपूर्ण रही है।

ब्रज शब्द से अभिप्राय





ब्रज शब्द से अभिप्राय


ब्रज शब्द से अभिप्राय सामान्यत: मथुरा ज़िला और उसके आस-पास का क्षेत्र समझा जाता है। वैदिक साहित्य में ब्रज शब्द का प्रयोग प्राय: पशुओं के समूह, उनके चारागाह (चरने के स्थान) या उनके बाडे़ के अर्थ में है। रामायण, महाभारत और समकालीन संस्कृत साहित्य में सामान्यत: यही अर्थ ‘ब्रज’ का संदर्भ है। ‘स्थान’ के अर्थ में ब्रज शब्द का उपयोग पुराणों में गाहे-बगाहे आया है, विद्वान मानते हैं कि यह गोकुल के लिये प्रयुक्त है। ‘ब्रज’ शब्द का चलन भक्ति आंदोलन के दौरान पूरे चरम पर पहुँच गया। चौदहवीं शताब्दी की कृष्ण भक्ति की व्यापक लहर ने ब्रज शब्द की पवित्रता को जन-जन में पूर्ण रूप से प्रचारित कर दिया । सूर, मीरां (मीरा), तुलसीदास, रसखान के भजन तो जैसे आज भी ब्रज के वातावरण में गूंजते रहते हैं।
कृष्ण भक्ति में ऐसा क्या है जिसने मीरां (मीरा) से राज-पाट छुड़वा दिया और सूर की रचनाओं की गहराई को जानकर विश्व भर में इस विषय पर ही शोध होता रहा कि सूर वास्तव में दृष्टिहीन थे भी या नहीं। संगीत विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रज में सोलह हज़ार राग रागनिंयों का निर्माण हुआ था। जिन्हें कृष्ण की रानियाँ भी कहा जाता है । ब्रज में ही स्वामी हरिदास का जीवन, ‘एक ही वस्त्र और एक मिट्टी का करवा’ नियम पालन में बीता और इनका गायन सुनने के लिए राजा महाराजा भी कुटिया के द्वार पर आसन जमाए घन्टों बैठे रहते थे। बैजूबावरा, तानसेन, नायक बख़्शू (ध्रुपद-धमार) जैसे अमर संगीतकारों ने संगीत की सेवा ब्रज में रहकर ही की थी। अष्टछाप कवियों के अलावा बिहारी, अमीर ख़ुसरो, भूषण, घनानन्द आदि ब्रज भाषा के कवि, साहित्य में अमर हैं। ब्रज भाषा के साहित्यिक प्रयोग के उदाहरण महाराष्ट्र में तेरहवीं शती में मिलते हैं। बाद में उन्नीसवीं शती तक गुजरात, असम, मणिपुर, केरल तक भी साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ। ब्रज भाषा के प्रयोग के बिना शास्त्रीय गायन की कल्पना करना भी असंभव है। आज भी फ़िल्मों के गीतों में मधुरता लाने के लिए ब्रज भाषा का ही प्रयोग होता है।

पुत्रदा एकादशी व्रत कथा

श्रावण पुत्रदा एकादशी
पुत्रदा एकादशी व्रत कथा


श्री युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! श्रावण शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? व्रत करने की विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। मधुसूदन कहने लगे कि इस एकादशी का नाम पुत्रदा है। अब आप शांतिपूर्वक इसकी कथा सुनिए। इसके सुनने मात्र से ही वायपेयी यज्ञ का फल मिलता है।

द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। उसका मानना था कि जिसके संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। 

वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा- हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है। न मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन छीना है। किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने नहीं ‍ली, प्रजा को पुत्र के समान पालता रहा। मैं अपराधियों को पुत्र तथा बाँधवों की तरह दंड देता रहा। कभी किसी से घृणा नहीं की। सबको समान माना है। सज्जनों की सदा पूजा करता हूँ। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मेरे पु‍त्र नहीं है। सो मैं अत्यंत दु:ख पा रहा हूँ, इसका क्या कारण है? 

राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मं‍त्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए। राजा की उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि को देखते-फिरते रहे। 

एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार, जितेंद्रीय, जितात्मा, जितक्रोध, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था।

सबने जाकर ऋषि को प्रणाम किया। उन लोगों को देखकर मुनि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूँगा। मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह मत करो। 

लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले- हे महर्षे! आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं। अत: आप हमारे इस संदेह को दूर कीजिए। महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है। फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी है।

उन लोगों ने आगे कहा कि हम लोग उसकी प्रजा हैं। अत: उसके दु:ख से हम भी दु:खी हैं। आपके दर्शन से हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं। अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बतलाएँ।

यह वार्ता सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था। निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म किए। यह एक गाँव से दूसरे गाँव व्यापार करने जाया करता था। 

एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्याह्न के समय वह जबकि वह दो दिन से भूखा-प्यासा था, एक जलाशय पर जल पीने गया। उसी स्थान पर एक तत्काल की ब्याही हुई प्यासी गौ जल पी रही थी। 

राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसीलिए राजा को यह दु:ख सहना पड़ा। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है। ऐसा सुनकर सब लोग कहने लगे कि हे ऋषि! शास्त्रों में पापों का प्रायश्चित भी लिखा है। अत: जिस प्रकार राजा का यह पाप नष्ट हो जाए, आप ऐसा उपाय बताइए।

लोमश मुनि कहने लगे कि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं, तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप अवश्य नष्ट हो जाएगा, साथ ही राजा को पुत्र की अवश्य प्राप्ति होगी। 

लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर मंत्रियों सहित सारी प्रजा नगर को वापस लौट आई और जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया।

इसके पश्चात द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया गया। उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसवकाल समाप्त होने पर उसके एक बड़ा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ।

इसलिए हे राजन! इस श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा पड़ा। अत: संतान सुख की इच्छा हासिल करने वाले इस व्रत को अवश्य करें। इसके माहात्म्य को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और इस लोक में संतान सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है।

Radhey Krishna


भगवान के भोग का फल

भगवान के भोग का फल

      एक सेठजी बड़े कंजूस थे। एक दिन दुकान पर् बेटे को बैठा दिया और बोले कि बिना पैसा लिए किसी को कुछ मत देना, मैं अभी आया।अकस्मात एक संत आये जो अलग अलग जगह से एक समय की भोजन सामग्री लेते थे, लड़के से कहा बेटा जरा नमक देदो। लड़के ने सन्त को डिब्बा खोल कर एक चम्मच नमक दिया। सेठजी आये तो देखा कि एक डिब्बा खुला पड़ा था, सेठजी ने कहा कि क्या बेचा, बेटा बोला एक सन्त जो तालाब पर् रहते हैं उनको एक चम्मच नमक दिया था। सेठ का माथा ठनका अरे मूर्ख इसमें तो जहरीला पदार्थ है। 
      अब सेठजी भाग कर संतजी के पास गए, सन्तजी भगवान के भोग लगाकर थाली लिए भोजन करने बैठे ही थे सेठजी दूर से ही बोले महाराजजी रुकिए आप जो नमक लाये थे वो जहरीला पदार्थ था।आप भोजन नहीं करें।
       संतजी बोले भाई हम तो प्रसाद लेंगे ही क्योंकि भोग लगा दिया है और भोग लगा भोजन छोड़ नहीं सकते हाँ अगर भोग नहीं लगता तो भोजन नही करते और शुरू कर दिया भोजन। सेठजी के होश उड़ गए, बैठ गए वहीं पर्। रात पड़ गई सेठजी वहीं सो गए कि कहीं संतजी की तबियत बिगड़ गई तो कम से कम बैद्यजी को दिखा देंगे तो बदनामी से बचेंगे। सोचते सोचते नींद आ गई। सुबल जल्दी ही सन्त उठ गए और नदी में स्नान करके स्वस्थ दशा में आ रहे हैं। सेठजी ने कहा महाराज तबियत तो ठीक है। सन्त बोले भी भगवान की कृपा है, कह कर मन्दिर खोला तो देखते हैं कि भगवान का श्री विग्रह के दो भाग हो गए शरीर कला पड़ गया। अब तो सेठजी सारा मामला समझ गए कि अटल विश्वास से भगवान ने भोजन का जहर भोग के रूप में स्वयं ने ग्रहण कर लिया और भक्त को प्रसाद का ग्रहण कराया।
     सेठजी ने आज घर आकर बेटे को घर दुकान सम्भला दी और स्वयं भक्ति करने सन्त शरण चले गए।
   शिक्षा :-  भगवान को निवेदन करके भोग लगा करके ही भोजन करें, भोजन अमृत बन जाता है। 

  आइये आज से ही नियम लें कि भोजन बिना भोग लगाएं नहीं करेंगे।

बहुत ही सुंदर प्रसंग





🌷बहुत ही सुंदर प्रसंग है बिहारी जी का अवश्य पढे श्री राधे 🌷
        💕 ।। विश्वास ।। 💕


भगत  कबीर  जी  की  बेटी की  शादी  का  समय नजदीक  आ  रहा  था। सभी  नगर  वासीयों  में कानाफूसी  चल  रही  थी। कि  देखो  कबीर  की  बेटी  की  शादी  है,और  इनको कोई  फिक्र  ही  नहीं।पता  नहीं  यह  बरातियों  की आओभगत  कर  भी  पाएँगे या  नहीं...?

उधर  किसी  ने  लड़के  वालों के  कानों  तक  यह  बात पहुँचा  दी  कि  कबीर  ने  न तो  अभी  तक  शादी  की कोई  तैयारी  की  है ,और  न ही  दान  दहेज  का  कोई इंतजाम  किया  है। जैसे  जैसे  वक्त  बितता गया, लोगों  की  सुगबुगाहट  तेज हो  गई।

इतने  में  शादी  का  दिन  भी आ  गया। पूरा  गाँव  विवाह स्थल  की  ओर  चल  पड़ा , कुछ  तो  ऐसै  लोग  भी  थे  जो  सिर्फ  यह  देखने  के  लिए  गये  कि  कबीर  जी  की पगड़ी  उछलते  देख  सकें । लेकिन  कबीर  जी  सुबह पहले  पहर  ही  घर  से  दूर एक  टीले  के  पीछे  जा  के भजन  बंदगी  में  बैठ  गये। मालिक  से  अरदास  करने लगे ,
हे  ठाकुर जी  आपने  मुझे  जिस  मकसद  के  लिए  भेजा  है,मैं  तो  उसी में  लीन  हूँ, बाकि  आप  ही संभाले ।

खैर  शाम  होते  होते  भजन बंदगी  में  बैठे  कबीर  जी  के कानों  में  आवाजें  आनी  शुरू  हुईं,  धन्य   है  कबीर धन्य  हैं  कबीर,,

कबीर  जी  ने  आँखें  खोलकर  देखा  कि  कुछ  गाँव  वाले  वहाँ  से  गुजर  रहे हैं । कबीर  जी  ने  अपनी दोशाला  से  मुँह  ढंका  और उनसे  पूछा ,भाई  क्या  हुआ ?

किस  कबीर  की  बात  कर रहे  हो ?
क्या  वह  जुलाहा? ?

लोगों  ने  कहा  --हाँ भाई ,ऐसी  शादी  तो  आज तक  नहीं  देखी।।इतना  दान दहेज  बहुत  सारे  पकवान ...
 
वाह  भई  वाह 
मजेदार  लजीज  व्यंजन, बोलते  हुए  वे लोग  आगे बढ गये। कबीर  जी  ने  सोचा  कि  कहीं  यह  मेरा  मजाक  तो नहीं  बना  रहे,जल्दी  जल्दी घर  की  तरफ  भागे । वहाँ  का  नजारा  देख  हैरान रह  गये ,पूरा  घर  चमचमा रहा  था  चारों  तरफ  लोग वाह  वाह  कर  रहे  थे, इतने  में  कबीर  जी  की  बीवी  उनके  पास  आकर बोलीं,सुबह  से  शादी  की तैयारी  में  भाग  दौड़  कर  रहे  हो,अब  तो  कपड़े  बदल  लो, बेटी  की  डोली  विदा  करने का  वक्त  हो  गया  है....!!

कबीर  जी  की  आँखों  में पानी  आ  गया ,और  धीरे  से बोले--  भागयवान  मैं  सुबह पहर  से  ही  घर  से  निकल गया  था।

उनकी  बीवी  सारा  माजरा समझ  चुकीं  थीं  कि ठाकुर जी  खुद  ही  कबीर  जी का  रूप  बनाकर  हमारे  घर भाग  दौड  कर  रहे  थे।।
अब  दोनों  के  ही  आंखों  में शुक्र  शुक्र  शुक्र  के  आंसू थे।।।।।।।

🌷राधेराधे🌷

जहां विश्वास है वहां सबूत की ज़रूरत नहीं होती...

आखिर गीता पर भी कहाँ श्रीकृष्ण के दस्तखत हैं!

||जय श्री राधे ||